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वच sweet flag

वच sweet flag

बच मूल रूप से यूरोप और मध्य एशिया का पौधा है। यह पौधा भारत में कब से उगाया जाता है। इसके बारे में किसी भी प्रकार का कोई भी प्रमाण नहीं मिलता है। भारत में हिमालय में समुद्र तल से 6,000 फीट की ऊंचाई तक इसके जंगली या कृषिजन्य पौधे मिलते हैं। नाग और मानीपुर की पहाड़ियों में तथा कश्मीर के झीलों व खेतों के किनारे बच बहुत अधिक मात्रा में होता है। बच का सुखाया हुआ मूलस्तम्भ या तने की लकड़ी बाजारों में घोड़बच के नाम से बिकती है। बच की कई जातियां पाई जाती हैं जिनमें बल वच या पारसीक बच प्रमुख हैं।

Bach is a plant native to Europe and Central Asia. Since when is this plant grown in India. There is no evidence of any kind about this. Its wild or cultivated plants are found in the Himalayas in India up to an altitude of 6,000 feet above sea level. In the hills of Nag and Manipur and along the banks of lakes and fields of Kashmir, it is found in abundance. The dried stem or stem wood of Bach is sold in the market as Ghodbach. Several species of Bach are found in which Bal Vach or Parsik Bach are prominent.

गुण (Property)

वच अधिक गंधयुक्त, चटपटा-तीखा, उल्टी लाने वाला और पाचनशक्तिवर्द्धक है। यह मलमूत्र को साफ करने वाला है। इसके अतिरिक्त यह पेट दर्द, भूत, हानिकारक कीटाणु, मिर्गी, वात तथा उन्माद और अफारा को दूर वाली औषधि है। यह औषधि बुखार और हृदय की गति को सामान्य करती है तथा गले के रोग एवं सांस की बीमारी में भी लाभकारी है।

Vacha is more odorous, spicy-tart, vomiting and digestive power. It is supposed to clean the excrement. Apart from this, it is a medicine for stomachache, ghosts, harmful germs, epilepsy, vata and mania and disorder. This medicine normalizes fever and heart rate and is also beneficial in throat diseases and respiratory diseases.

हानिकारक प्रभाव (Harmful effects)

बच का अधिक प्रयोग करना नुकसानदायक है। यह गर्म स्वभाव वालों के लिए अधिक नुकसानदायक है और उनमें सिर दर्द पैदा करती है।

Excess use of escape is harmful. It is more harmful for hot tempered people and causes headache in them.

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

सूर्यावर्त (सूर्य निकलने के साथ शुरू होने दर्द सिर दर्द) :Suryavart (pain headache starting with sunrise) :


बच और पीपल के चूर्ण को सुंघाने से सूर्यावर्त मिटता है। सिर दर्द में बच के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) का लेप बनाकर सिर एवं दर्द वाली जगह पर लेप करने से दर्द में आराम मिलता है। बच को पानी में पीसकर सिर पर लेप करने से मस्तक का दर्द खत्म होता है।

Smelling the powder of Bacha and Peepal removes the sun. In headache, making a paste of the remaining Panchang (root, stem, leaf, fruit and flower) and applying it on the head and the pain area provides relief in pain. Grind the bacha in water and apply it on the head, it ends headache.

मस्तिष्क शक्तिवर्द्धक :brain enhancer:


बच का चूर्ण, पानी, दूध और घी के को एक साथ मिला लें, फिर इसे लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की मात्रा में सुबह-शाम 1 साल तक या कम से कम 1 महीने तक करने से मनुष्य की स्मरणशक्ति में वृद्धि होती है। 10 ग्राम बच के चूर्ण को 250 ग्राम बूरे के साथ पाक बनाकर रोज 10 ग्राम सुबह-शाम खाने से भूलने की बीमारी समाप्त हो जाती है।

Mix the powder of bacha, water, milk and ghee together, then taking it in the quantity of one-fourth of one gram in the morning and evening for 1 year or at least for 1 month, there is an increase in the memory of man. After cooking 10 grams of leftover powder with 250 grams of bure, taking 10 grams every morning and evening ends forgetfulness.

गले का दर्द :Throat Pain:


बच के लगभग आधा ग्राम चूर्ण को थोड़े गर्म दूध में डालकर दिन में 3 बार पिलाने से गले में जमा हुआ कफ ढ़ीला पड़कर निकल जाता है और गले का दर्द खत्म हो जाता है।

Mix half a gram of the remaining powder in some warm milk and give it thrice a day, it loosens the phlegm in the throat and ends throat pain.

गलगंड:Goiter:


बच के चूर्ण और पीपल के चूर्ण को शहद में मिलाकर या नीम के तेल में मिलाकर सुंघाने से गलगंडादि रोग खत्म हो जाते हैं। अपस्मार (मिर्गी) : वच को कपड़े से छानकर चूर्ण बना लें, फिर इसे लगभग आधा ग्राम से 1 ग्राम तक लेकर शहद के साथ सुबह-शाम चटाने से उन्माद और अपस्मार में बहुत लाभ होता है। इस प्रयोग के दौरान केवल चावल और दूध का इस्तेमाल करें।

Smelling the leftover powder and powder of peepal mixed with honey or mixed with neem oil, ends goiter. Epilepsy: Make a powder after filtering the vacha with a cloth, then licking it with honey in the morning and evening, taking about half a gram to 1 gram, it is very beneficial in delirium and dyspnoea. Use only rice and milk during this experiment.

दमा-खांसी :Asthmatic cough:


25 ग्राम वच को लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग पानी के साथ उबालें, चौथाई पानी शेष रह जाने पर दिन में 3 खुराक के रूप में सेवन करने से सूखी खांसी, पेट में गैस का बनना और पेट का दर्द खत्म होता है। बच्चों की खांसी में मां के दूध में वच (बच) को घिसकर पिलाने से लाभ होता है। दमे के रोगी को वच की 2 ग्राम की मात्रा लेनी चाहिए। उसके बाद हर 3 घण्टे के बाद लगभग आधा ग्राम की मात्रा लेनी चाहिए। वच के चूर्ण को कपड़े में रखकर सूंघने से प्रतिश्याय समाप्त होता है।

Boil 25 grams of vacha with about one-fourth part of water, after the remaining quarter of the water, take it in the form of 3 doses in a day, it ends dry cough, gas formation in the stomach and colic. In the cough of children, grinding vacha in mother's milk and giving it is beneficial. Asthma patient should take 2 grams of Vacha. After that, about half a gram should be taken after every 3 hours. Putting the powder of Vacha in a cloth and smelling it ends pratishyaya.

खूनी दस्त :bloody diarrhea


खूनी दस्त (रक्त अतिसार) तथा ऑवदस्त में वच, धनिया तथा जीरे का काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिए। तीनों को समान (लगभग 10 ग्राम) मात्रा में लेकर 100 मिलीलीटर पानी में उबालें, 20 मिलीलीटर शेष रहने पर छानकर सुबह-शाम पीयें। बच की जड़ का काढ़ा बनाकर 30 मिलीलीटर की मात्रा में पिलाने से खूनी दस्त एवं आमातिसार खत्म हो जाता है। 

A decoction of vacha, coriander and cumin should be given in bloody diarrhea (blood diarrhoea) and avadast. Boil all three in equal quantity (about 10 grams) in 100 ml water, filter remaining 20 ml and drink it in the morning and evening. Make a decoction of the root of bacha and take it in 30 ml quantity, it ends bloody diarrhea and diarrhoea.

अफारा (पेट में गैस का बनना) :Afara (gas formation in the stomach):


बच्चों का दर्द युक्त अफारा मिटाने के लिए, बच को पानी में घिसकर पेट पर लेप करना चाहिए। बच के कोयले को एरण्डी के तेल या नारियल के तेल में पीसकर बच्चे के पेट पर लेप करने से दर्द वाला अफारा खत्म होता है।

To remove the pain associated with children, the child should be rubbed in water and applied on the stomach. Grind the remaining coal with castor oil or coconut oil and apply it on the stomach of the child, it ends the painful rumblings.

बच्चों का अतिसार :Children's Diarrhea:


बच को जलाने से प्राप्त कोयले की लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग राख पानी में घोलकर बच्चों को पिलाने से बच्चों का अतिसार समाप्त हो जाता है।

After burning one-fourth of the coal obtained by burning the ash, dissolve the ash in water and give it to children, it ends diarrhea in children.

बवासीर :hemorrhoid :


भांग, बच और अजवायन, तीनों को समान मात्रा में लेकर आग में जलाकर इसकी धूंनी बवासीर में देने से बवासीर का दर्द खत्म हो जाता है। सुख प्रसव (आसानी से प्रजनन) : पानी में घिसा हुआ वच में एरण्ड का तेल मिलाकर नाभि पर लेप करने से बच्चा सुख पैदा होता है। प्रसव के बाद कमजोरी मिटाने के लिए वच का 20-20 ग्राम मात्रा में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पिलाना चाहिए।

Taking hemp, bacha and carom seeds in equal quantity, burning it in the fire and giving its fumigation in piles ends the pain of piles. Pleasure delivery (ease of reproduction): Mixing castor oil in a vacha soaked in water and applying it on the navel gives happiness to the child. To remove weakness after delivery, make a decoction of 20 grams each and give it morning and evening.

मुंह का लकवा :Mouth paralysis:


लगभग आधा ग्राम वच का चूर्ण और लगभग आधा ग्राम शुंठी का चूर्ण दोनों को शहद में मिलाकर दिन में 2 से 3 बार चाटने से अर्दित रोग (वह रोग जिसमें रोगी का मुंह टेढ़ा हो जाता हैं), यानि मुंह का लकवा खत्म होता है।

Mixing about half gram powder of vacha and about half gram powder of shunthi in honey, licking it 2-3 times a day ends Ardit disease (the disease in which the patient's mouth becomes crooked), that is, the paralysis of the mouth ends.

बुखार :Fever :


बच को पानी में मिलाकर नाक पर लेप करने से जुकाम, खांसी और उससे पैदा होने वाला तेज बुखार ठीक हो जाता है। हरड़, घी और बच का धुंआ देने से विषम बुखार में लाभ होता है। छोटे बच्चों के बुखार में बच की जड़ को पानी में घिसकर हाथ-पैरों पर लगाने से लाभ होता है।

Mixing Bacha with water and applying it on the nose ends cold, cough and high fever arising out of it. Giving the smoke of Harad, Ghee and Bacha is beneficial in fever. In the fever of young children, rubbing the root of Bacha in water and applying it on the hands and feet is beneficial.

हकलाने की बीमारी :Stammering disease:


रुक-रुक कर बोलने की बीमारी में रोगी को ताजी बच की तना (कांड) का 1 ग्राम का टुकड़ा सुबह-शाम चूसना चाहिए। इसे 3 महीने तक करने से हकलाने की बीमारी में अत्यधिक लाभ मिलता है।

In the disease of intermittent speech, the patient should suck 1 gram piece of fresh chives (kand) in the morning and evening. Doing this for 3 months gives immense benefit in stammering disease.

जमाल गोटे का जहर :Jamal Gote's Poison:


वच को आग में जलाकर प्राप्त कोयले का 1 ग्राम राख को पानी में मिलाकर पिलाने से जमाल गोटे का जहर शांत हो जाता है और सभी अन्य रोग भी शांत हो जाते हैं।

Mixing 1 gram ash of coal obtained by burning a vacha in a fire and drinking it, the poison of Jamal goat gets pacified and all other diseases also get pacified.

अंडकोष का बढ़ना :Enlargement of testicles:


बच और सरसों को पानी में पीसकर लेप करने से हर प्रकार की अंडकोष के बढ़ने की बीमारी से कुछ ही दिनों में छुटकारा मिलता है।

Applying paste by grinding bacha and mustard in water, gets rid of all types of testicular enlargement disease in a few days.

पेट के कृमि (कीड़ें) :Stomach worms:


2 ग्राम बच के चूर्ण को सेंकी हुई हींग लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग के साथ खिलाने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

Feeding 2 grams of leftover powder with one-fourth part of roasted asafetida with about 1 gram destroys stomach worms.



Dr. Manoj Bhai Rathore 
Ayurveda Doctor
Email id:life.panelbox@gmail.com
क्या करे क्या न करे(स्वास्थ्य सुझाव)What to do, what not to do (health tips)
Self site:-see you again search आप फिर से खोज देखें
yourselfhealthtips.blogspot.com


आवश्यक दिशा निर्देश
1. हमारा आपसे अनुरोध है कि यदि आप किसी भी तरह के रोग से पीड़ित हैं तो आपको अपना इलाज किसी अनुभवी चिकित्सक की देख-रेख में ही कराना चाहिए क्योंकि बिना चिकित्सक की सलाह के दवा लेना और एकसाथ एक से अधिक पैथियों का प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है।
2. अगर हमारी वेबसाइट में दिए गए नुस्खों या फार्मूलों से आपको किसी भी प्रकार की हानि होती है, तो उसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे, क्योंकि इन नुस्खों को गलत तरीके से लेने के कारण ये विपरीत प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। इसके अलावा आयुर्वेदिक नुस्खों का प्रभाव रोगी की प्रकृति, समय और जलवायु के कारण अलग-अलग होता है।
3. औषधि का सेवन करते समय आपको अपने खान-पान  (पथ्यापथ्य)  का पूरा ध्यान रखना चाहिए  क्योंकि किसी भी रोग में औषधि के प्रयोग के साथ-साथ परहेज भी रोग को ठीक करने में महत्वपू्र्ण भूमिका निभाता है।
4. रोगी को कोई भी दवा देने से पहले यह जानना आवश्यक है कि रोग की उत्पत्ति किस कारण से हुई है। जिस कारण से रोग पैदा हुआ है उसकी पूरी जानकारी रोगी से लेनी बहुत जरूरी होती है, क्योंकि अधूरे ज्ञान के कारण रोगी का रोग कुछ होता है और उसे किसी अन्य रोग की औषधि दे दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप रोगी की बीमारी समाप्त होने के बजाय असाध्य रोग में बदल जाती है।
5. शरीर को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाने के लिए शुद्ध आहार की जानकारी बहुत ही जरूरी है, क्योंकि इस जानकारी से आप असाध्य से असाध्य रोग को जड़ से समाप्त कर शरीर को पूर्ण रूप से रोग मुक्त कर सकते हैं।
6. प्रत्येक पैथी में कुछ दवाईयां कुछ रोगों पर बहुत ही असरदार रूप से प्रभावकारी होती हैं।
7. प्रत्येक पैथी का अविष्कार आवश्यकता पड़ने पर ही हुआ है क्योंकि एक जवान और मजबूत आदमी को मसाज, एक्यूप्रेशर,  एक्यूपेंचर, हार्डपेथियों एवं औषधियों द्वारा लाभ पहुंचाया जा सकता है लेकिन असाध्य रोग से पीड़ित, शारीरिक रूप से कमजोर और बूढ़े रोगियों पर इन पेथियों का उपयोग नहीं किया जा सकता है।
8. आयुर्वेद और होम्योपैथिक के सिद्धांत बिल्कुल मिलते-जुलते हैं क्योंकि आयुर्वेद से ही होम्योपैथिक की उत्पत्ति हुई है जैसे- जहर को जहर द्वारा ही उतारा जा सकता है, कांटे को कांटे से ही निकाला जा सकता है।
9. रोगी के लक्षणों की जांच के दौरान चिकित्सक को तीन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए, पहला-देखना,  दूसरा-स्पर्श  (छूना)  और तीसरा- प्रश्न करना या रोगी से सवाल पूछना। महान ऋषि ‘सुश्रुत’ के अनुसार कान,  त्वचा,  आंख,  जीभ, नाक इन  5 इन्द्रियों के माध्यम से किसी भी तरह के रोग की वास्तविकता की आसानी से पहचान की जा सकती है।
10. चिकित्सक को चाहिए कि, वह तीमारदार  (रोगी की देखभाल करने वाला)  से रोगी की शारीरिक ताकत,  स्थिति,  प्रकृति आदि की पूरी जानकारी लेने के बाद ही उसका इलाज करे।
11. चिकित्सक को इलाज करने से पहले रोगी को थोड़ी-सी दवा का सेवन कराके इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि यह दवा रोगी की शारीरिक प्रकृति के अनुकूल है या नहीं।
12. जिस प्रकार व्याकरण के पूर्ण ज्ञान के बिना शिक्षक योग्य नहीं हो पाता है, उसी प्रकार से बीमारी के बारे में पूरी जानकारी हुए बिना किसी प्रकार की औषधि का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि हर औषधि के गुण-धर्म और दोष अलग-अलग होते हैं।

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