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बहरेपन का उपचार Treatment of deafness

बहरेपन का उपचार Treatment of deafness

 उपचार - 1:Treatment - 1:-

गौमूत्र, अथवा ऊंटनी के मूत्र में सेंध नमक मिलाकर कान में डालने से बहरापन जल्दी ही दूर होता है

Gauamutra, or camel urine mixed with rock salt and put in the ear, deafness is soon removed.

उपचार - 2:Treatment - 2:-

15 ग्राम सफ़ेद फिटकरी की भष्म, 50 ग्राम कलमी शोर और 10ग्राम नौसादर को 150 ग्राम सरसों के तेल में मिलाकर पकाए, फिर इसको छान कर 2-2 बून्द कान में डालने से बहरापन ठीक होता है

Cook 15 grams of white alum, 50 grams of Kalmi Shor and 10 grams of fennel with 150 grams of mustard oil, then filter it and add 2-2 drops to the ear to cure deafness.

उपचार - 3:Treatment - 3:-

2-3 लहसुन की कलियों को 2-3 तोले तिल के तेल में जल जाने तक पकाए, फिर तेल को छान कर 2-3 बूँद कान में प्रतिदिन कान में डालने से जल्दी ही बहरापन दूर हो जाता है


Cook 2-3 garlic buds in 2-3 sesame oil till it burns, then filter the oil and put 2-3 drops in the ear everyday, it quickly reduces deafness.

उपचार - 4:Treatment - 4:-

धतूरे का पीला पत्ता गर्म करके उसका रस निकालकर 2 हफ्ते तक कान में डालने से बहरापन दूर होता है

Heat the yellow leaf of dhatura and extract its juice and put it in the ear for 2 weeks, it removes deafness.

उपचार - 5:Treatment - 5:-

लहसुन की 8-10 कलियाँ लेकर उसको तिल्ली के तेल में तलकर उसकी 2-3 बूँद प्रतिदिन कान में डालने से बहरापन दूर होता है

After taking 8-10 buds of garlic, frying it in spleen oil and pouring 2-3 drops of it into the ear daily, removes deafness.

उपचार - 6:Treatment - 6:-

हींग को स्त्री के दूध में घिसकर कान में डालने से बहरापन ठीक हो जाता है

Deafness is cured by grinding asafetida in the milk of the woman and putting it in the ear.


 

Dr.Manoj Bhai Rathore 
Ayurveda doctor
Email id:life.panelbox@gmail.com
क्या करे क्या न करे(स्वास्थ्य सुझाव)What to do, what not to do (health tips)
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आवश्यक दिशा निर्देश
1. हमारा आपसे अनुरोध है कि यदि आप किसी भी तरह के रोग से पीड़ित हैं तो आपको अपना इलाज किसी अनुभवी चिकित्सक की देख-रेख में ही कराना चाहिए क्योंकि बिना चिकित्सक की सलाह के दवा लेना और एकसाथ एक से अधिक पैथियों का प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है।
2. अगर हमारी वेबसाइट में दिए गए नुस्खों या फार्मूलों से आपको किसी भी प्रकार की हानि होती है, तो उसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे, क्योंकि इन नुस्खों को गलत तरीके से लेने के कारण ये विपरीत प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। इसके अलावा आयुर्वेदिक नुस्खों का प्रभाव रोगी की प्रकृति, समय और जलवायु के कारण अलग-अलग होता है।
3. औषधि का सेवन करते समय आपको अपने खान-पान  (पथ्यापथ्य)  का पूरा ध्यान रखना चाहिए  क्योंकि किसी भी रोग में औषधि के प्रयोग के साथ-साथ परहेज भी रोग को ठीक करने में महत्वपू्र्ण भूमिका निभाता है।
4. रोगी को कोई भी दवा देने से पहले यह जानना आवश्यक है कि रोग की उत्पत्ति किस कारण से हुई है। जिस कारण से रोग पैदा हुआ है उसकी पूरी जानकारी रोगी से लेनी बहुत जरूरी होती है, क्योंकि अधूरे ज्ञान के कारण रोगी का रोग कुछ होता है और उसे किसी अन्य रोग की औषधि दे दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप रोगी की बीमारी समाप्त होने के बजाय असाध्य रोग में बदल जाती है।
5. शरीर को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाने के लिए शुद्ध आहार की जानकारी बहुत ही जरूरी है, क्योंकि इस जानकारी से आप असाध्य से असाध्य रोग को जड़ से समाप्त कर शरीर को पूर्ण रूप से रोग मुक्त कर सकते हैं।
6. प्रत्येक पैथी में कुछ दवाईयां कुछ रोगों पर बहुत ही असरदार रूप से प्रभावकारी होती हैं।
7. प्रत्येक पैथी का अविष्कार आवश्यकता पड़ने पर ही हुआ है क्योंकि एक जवान और मजबूत आदमी को मसाज, एक्यूप्रेशर,  एक्यूपेंचर, हार्डपेथियों एवं औषधियों द्वारा लाभ पहुंचाया जा सकता है लेकिन असाध्य रोग से पीड़ित, शारीरिक रूप से कमजोर और बूढ़े रोगियों पर इन पेथियों का उपयोग नहीं किया जा सकता है।
8. आयुर्वेद और होम्योपैथिक के सिद्धांत बिल्कुल मिलते-जुलते हैं क्योंकि आयुर्वेद से ही होम्योपैथिक की उत्पत्ति हुई है जैसे- जहर को जहर द्वारा ही उतारा जा सकता है, कांटे को कांटे से ही निकाला जा सकता है।
9. रोगी के लक्षणों की जांच के दौरान चिकित्सक को तीन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए, पहला-देखना,  दूसरा-स्पर्श  (छूना)  और तीसरा- प्रश्न करना या रोगी से सवाल पूछना। महान ऋषि ‘सुश्रुत’ के अनुसार कान,  त्वचा,  आंख,  जीभ, नाक इन  5 इन्द्रियों के माध्यम से किसी भी तरह के रोग की वास्तविकता की आसानी से पहचान की जा सकती है।
10. चिकित्सक को चाहिए कि, वह तीमारदार  (रोगी की देखभाल करने वाला)  से रोगी की शारीरिक ताकत,  स्थिति,  प्रकृति आदि की पूरी जानकारी लेने के बाद ही उसका इलाज करे।
11. चिकित्सक को इलाज करने से पहले रोगी को थोड़ी-सी दवा का सेवन कराके इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि यह दवा रोगी की शारीरिक प्रकृति के अनुकूल है या नहीं।
12. जिस प्रकार व्याकरण के पूर्ण ज्ञान के बिना शिक्षक योग्य नहीं हो पाता है, उसी प्रकार से बीमारी के बारे में पूरी जानकारी हुए बिना किसी प्रकार की औषधि का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि हर औषधि के गुण-धर्म और दोष अलग-अलग होते हैं।

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