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अनन्नास के गुण Pineapple Properties

अनन्नास के गुण Pineapple Properties

अनन्नास का रस पित्तनाशक (पित्त को नष्ट करने वाला), कृमिनाशक (कीड़ों को नष्ट करने वाला) एवं हृदय के लिए हितकारी होता है। इसके अतिक्ति अनन्नास पेट के रोग, प्लीहा वृद्धि तथा पीलिया आदि रोगों को मिटाता है। अनन्नास में जीरा, नमक और चीनी डालकर खाने से रुचिपूर्ण लगता है। 

Pineapple juice is useful for the use of bile destroyer (bile destroyer), anthelmintic (insect destroyer) and heart. In addition, pineapple erases stomach diseases, spleen enlargement and jaundice etc. Eating cumin, salt and sugar in pineapple is interesting.

अनन्नास का बाहरी छिलका और भीतरी बीज निकालकर शेष भाग के टुकड़े करके रस पीना चाहिए। अनन्नास के रस में क्लोरीन होता है जो मूत्राशय (वह स्थान जहां पेशाब एकत्रित होता है) को उत्तेजना एवं गति देता है व विषैले और निरर्थक पदार्थों को बाहर निकालता है। शरीर पर सूजन हो जाने की स्थिति में भी यह लाभ करता है। 

The outer peel of pineapple and the inner seed should be extracted and the remaining portion cut into juice. Pineapple juice contains chlorine which stimulates and speeds up the bladder (the place where urine is collected) and removes toxic and waste substances. It is also beneficial in the event of swelling on the body.

अनन्नास का रस गले तथा मुंह के जीवाणुजन्य रोगों में प्रभावशाली सिद्ध होता है। अनन्नास के रस में स्थित `ब्रास्मेलिन´ नामक एंजाइम मानव शरीर के पाचक रस पेप्सिन के समान होता है। यह एंजाइम पाचन प्रक्रिया को सुचारू बनाता है। तत्त्व मात्रा तत्त्व मात्रा प्रोटीन 0.6 प्रतिशत विटामिन-बी2 120 I.U. वसा 0.1 प्रतिशत विटामिन-सी लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग प्रति100 ग्राम कार्बोहाइड्रेट (शर्करा) 12.0 प्रतिशत लौह लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग प्रति100 ग्राम पानी 86.5 प्रतिशत फास्फोरस 0.01 प्रतिशत विटामिन-ए 60 I.U. कैल्शियम 0.12 प्रतिशत.

Pineapple juice proves effective in bacterial diseases of throat and mouth. The enzyme called 'Brasmelin' located in pineapple juice is similar to pepsin, the digestive juice of human body. This enzyme makes the digestion process smooth. Element Quantity Protein Quantity Protein 0.6 Percent Vitamin-B2 120 I.U. Fat 0.1 percent Vitamin-C Fourth part of about 1 gram Carbohydrate (sugars) per 100 grams 12.0 percent Iron Fourth part of about 1 gram per 100 grams Water 86.5 percent Phosphorus 0.01 percent Vitamin-A 60 I.U. Calcium 0.12 percent.

Dr.Manoj Bhai Rathore 
Ayurveda doctor
Email id:life.panelbox@gmail.com
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आवश्यक दिशा निर्देश
1. हमारा आपसे अनुरोध है कि यदि आप किसी भी तरह के रोग से पीड़ित हैं तो आपको अपना इलाज किसी अनुभवी चिकित्सक की देख-रेख में ही कराना चाहिए क्योंकि बिना चिकित्सक की सलाह के दवा लेना और एकसाथ एक से अधिक पैथियों का प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है।
2. अगर हमारी वेबसाइट में दिए गए नुस्खों या फार्मूलों से आपको किसी भी प्रकार की हानि होती है, तो उसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे, क्योंकि इन नुस्खों को गलत तरीके से लेने के कारण ये विपरीत प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। इसके अलावा आयुर्वेदिक नुस्खों का प्रभाव रोगी की प्रकृति, समय और जलवायु के कारण अलग-अलग होता है।
3. औषधि का सेवन करते समय आपको अपने खान-पान  (पथ्यापथ्य)  का पूरा ध्यान रखना चाहिए  क्योंकि किसी भी रोग में औषधि के प्रयोग के साथ-साथ परहेज भी रोग को ठीक करने में महत्वपू्र्ण भूमिका निभाता है।
4. रोगी को कोई भी दवा देने से पहले यह जानना आवश्यक है कि रोग की उत्पत्ति किस कारण से हुई है। जिस कारण से रोग पैदा हुआ है उसकी पूरी जानकारी रोगी से लेनी बहुत जरूरी होती है, क्योंकि अधूरे ज्ञान के कारण रोगी का रोग कुछ होता है और उसे किसी अन्य रोग की औषधि दे दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप रोगी की बीमारी समाप्त होने के बजाय असाध्य रोग में बदल जाती है।
5. शरीर को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाने के लिए शुद्ध आहार की जानकारी बहुत ही जरूरी है, क्योंकि इस जानकारी से आप असाध्य से असाध्य रोग को जड़ से समाप्त कर शरीर को पूर्ण रूप से रोग मुक्त कर सकते हैं।
6. प्रत्येक पैथी में कुछ दवाईयां कुछ रोगों पर बहुत ही असरदार रूप से प्रभावकारी होती हैं।
7. प्रत्येक पैथी का अविष्कार आवश्यकता पड़ने पर ही हुआ है क्योंकि एक जवान और मजबूत आदमी को मसाज, एक्यूप्रेशर,  एक्यूपेंचर, हार्डपेथियों एवं औषधियों द्वारा लाभ पहुंचाया जा सकता है लेकिन असाध्य रोग से पीड़ित, शारीरिक रूप से कमजोर और बूढ़े रोगियों पर इन पेथियों का उपयोग नहीं किया जा सकता है।
8. आयुर्वेद और होम्योपैथिक के सिद्धांत बिल्कुल मिलते-जुलते हैं क्योंकि आयुर्वेद से ही होम्योपैथिक की उत्पत्ति हुई है जैसे- जहर को जहर द्वारा ही उतारा जा सकता है, कांटे को कांटे से ही निकाला जा सकता है।
9. रोगी के लक्षणों की जांच के दौरान चिकित्सक को तीन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए, पहला-देखना,  दूसरा-स्पर्श  (छूना)  और तीसरा- प्रश्न करना या रोगी से सवाल पूछना। महान ऋषि ‘सुश्रुत’ के अनुसार कान,  त्वचा,  आंख,  जीभ, नाक इन  5 इन्द्रियों के माध्यम से किसी भी तरह के रोग की वास्तविकता की आसानी से पहचान की जा सकती है।
10. चिकित्सक को चाहिए कि, वह तीमारदार  (रोगी की देखभाल करने वाला)  से रोगी की शारीरिक ताकत,  स्थिति,  प्रकृति आदि की पूरी जानकारी लेने के बाद ही उसका इलाज करे।
11. चिकित्सक को इलाज करने से पहले रोगी को थोड़ी-सी दवा का सेवन कराके इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि यह दवा रोगी की शारीरिक प्रकृति के अनुकूल है या नहीं।
12. जिस प्रकार व्याकरण के पूर्ण ज्ञान के बिना शिक्षक योग्य नहीं हो पाता है, उसी प्रकार से बीमारी के बारे में पूरी जानकारी हुए बिना किसी प्रकार की औषधि का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि हर औषधि के गुण-धर्म और दोष अलग-अलग होते हैं।

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