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निर्गुण्डी Nirgundi

निर्गुण्डी Nirgundi

निर्गुण्डी के पौधे सारे भारत में अपने आप उग आते हैं। इसके पौधे उष्ण (गर्म) प्रदेशों में बहुत ज्यादा मात्रा में पाये जाते हैं। इसे खेतों की मेंड़ों पर, बाग-बगीचों में तथा घरों में भी इसे लगाया जाता है। निर्गुण्डी के पत्तों को मसलने से एक विशेष प्रकार की दुर्गंध आती है।

Nirgundi plants grow on their own all over India. Its plants are found in large quantities in warm (hot) regions. It is planted on the rams of the fields, in orchards and even in homes. A special type of foul smell comes from mashing nirgundi leaves.

गुण (Property)

निर्गुण्डी कफवात को शान्त करती है। यह दर्द को दूर करती है और बुद्धि को बढ़ाती है। सूजन, घाव, बालों के रोग और हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करती है। पाचनशक्तिवर्द्धक, आम पाचन, यकृतउत्तेजक, कफ-खांसीनाशक, मूत्रवर्द्धक और गर्म होने के कारण माहवारी साफ लाती है। 

Nirgundi calms Kafawat. It removes pain and increases intelligence. It destroys inflammation, wounds, hair diseases and harmful germs. Maintains menstrual cycle due to digestive power, common digestion, hepatic, phlegm, cough and diuretics.
इसका उपयोग कोढ़, खुजली, बुखार, कान से मवाद आना, सिर में दर्द, लिंग की कमजोरी, साइटिका, अजीर्ण, मूत्राघात (पेशाब में धातु का आना), कमजोरी, आंखों की बीमारी तथा स्त्री के स्तनों में दूध की वृद्धि के लिए किया जाता है।

 It is used for leprosy, itching, fever, ear pus, headache, penis weakness, sciatica, indigestion, stroke (weakness of urine), weakness, eye disease and increase in milk in the breasts of the woman. goes.

हानिकारक प्रभाव (Harmful effects)

निर्गुण्डी को अधिक मात्रा में सेवन करने से सिर में दर्द, जलन व किडनी पर विपरीत बुरा प्रभाव पड़ सकता है। मात्रा : निर्गुण्डी के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, जड़ की छालों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम, बीज और फलों का चूर्ण 3 से 6 ग्राम तक ले सकते हैं।

 Consuming excessive quantity of Nirgundi can have adverse effects on headache, burning sensation and kidney. Quantity: 10 to 20 ml juice of Nirgundi leaves, 1 to 3 grams powder of root blisters, seeds and fruit powder can be taken from 3 to 6 grams.
Dr.Manoj Bhai Rathore
Ayurveda doctor
Email id:life.panelbox@gmail.com
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आवश्यक दिशा निर्देश
1. हमारा आपसे अनुरोध है कि यदि आप किसी भी तरह के रोग से पीड़ित हैं तो आपको अपना इलाज किसी अनुभवी चिकित्सक की देख-रेख में ही कराना चाहिए क्योंकि बिना चिकित्सक की सलाह के दवा लेना और एकसाथ एक से अधिक पैथियों का प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है।
2. अगर हमारी वेबसाइट में दिए गए नुस्खों या फार्मूलों से आपको किसी भी प्रकार की हानि होती है, तो उसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे, क्योंकि इन नुस्खों को गलत तरीके से लेने के कारण ये विपरीत प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। इसके अलावा आयुर्वेदिक नुस्खों का प्रभाव रोगी की प्रकृति, समय और जलवायु के कारण अलग-अलग होता है।
3. औषधि का सेवन करते समय आपको अपने खान-पान  (पथ्यापथ्य)  का पूरा ध्यान रखना चाहिए  क्योंकि किसी भी रोग में औषधि के प्रयोग के साथ-साथ परहेज भी रोग को ठीक करने में महत्वपू्र्ण भूमिका निभाता है।
4. रोगी को कोई भी दवा देने से पहले यह जानना आवश्यक है कि रोग की उत्पत्ति किस कारण से हुई है। जिस कारण से रोग पैदा हुआ है उसकी पूरी जानकारी रोगी से लेनी बहुत जरूरी होती है, क्योंकि अधूरे ज्ञान के कारण रोगी का रोग कुछ होता है और उसे किसी अन्य रोग की औषधि दे दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप रोगी की बीमारी समाप्त होने के बजाय असाध्य रोग में बदल जाती है।
5. शरीर को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाने के लिए शुद्ध आहार की जानकारी बहुत ही जरूरी है, क्योंकि इस जानकारी से आप असाध्य से असाध्य रोग को जड़ से समाप्त कर शरीर को पूर्ण रूप से रोग मुक्त कर सकते हैं।
6. प्रत्येक पैथी में कुछ दवाईयां कुछ रोगों पर बहुत ही असरदार रूप से प्रभावकारी होती हैं।
7. प्रत्येक पैथी का अविष्कार आवश्यकता पड़ने पर ही हुआ है क्योंकि एक जवान और मजबूत आदमी को मसाज, एक्यूप्रेशर,  एक्यूपेंचर, हार्डपेथियों एवं औषधियों द्वारा लाभ पहुंचाया जा सकता है लेकिन असाध्य रोग से पीड़ित, शारीरिक रूप से कमजोर और बूढ़े रोगियों पर इन पेथियों का उपयोग नहीं किया जा सकता है।
8. आयुर्वेद और होम्योपैथिक के सिद्धांत बिल्कुल मिलते-जुलते हैं क्योंकि आयुर्वेद से ही होम्योपैथिक की उत्पत्ति हुई है जैसे- जहर को जहर द्वारा ही उतारा जा सकता है, कांटे को कांटे से ही निकाला जा सकता है।
9. रोगी के लक्षणों की जांच के दौरान चिकित्सक को तीन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए, पहला-देखना,  दूसरा-स्पर्श  (छूना)  और तीसरा- प्रश्न करना या रोगी से सवाल पूछना। महान ऋषि ‘सुश्रुत’ के अनुसार कान,  त्वचा,  आंख,  जीभ, नाक इन  5 इन्द्रियों के माध्यम से किसी भी तरह के रोग की वास्तविकता की आसानी से पहचान की जा सकती है।
10. चिकित्सक को चाहिए कि, वह तीमारदार  (रोगी की देखभाल करने वाला)  से रोगी की शारीरिक ताकत,  स्थिति,  प्रकृति आदि की पूरी जानकारी लेने के बाद ही उसका इलाज करे।
11. चिकित्सक को इलाज करने से पहले रोगी को थोड़ी-सी दवा का सेवन कराके इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि यह दवा रोगी की शारीरिक प्रकृति के अनुकूल है या नहीं।
12. जिस प्रकार व्याकरण के पूर्ण ज्ञान के बिना शिक्षक योग्य नहीं हो पाता है, उसी प्रकार से बीमारी के बारे में पूरी जानकारी हुए बिना किसी प्रकार की औषधि का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि हर औषधि के गुण-धर्म और दोष अलग-अलग होते हैं।

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